अर्चना त्रिपाठी
भारतीय सार्वजनिक जीवन, शिक्षा जगत और समाज सेवा के एक युग का अध्याय डॉ. ज्ञानेश्वर यशवंतराव (डी. वाई.) पाटिल जी के अवसान के साथ समाप्त हो गया। 90 वर्षों का उनका समृद्ध जीवन-सफर इस बात का प्रेरणादायी उदाहरण है कि कैसे निष्ठा, दूरदृष्टि और निःस्वार्थ भाव से समाज और राष्ट्र के नवनिर्माण का संकल्प सिद्ध किया जा सकता है। कोल्हापुर के एक साधारण पृष्ठभूमि वाले गाँव से निकलकर त्रिपुरा, बिहार और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल पद की गरिमा बढ़ाने तक, उनकी पूरी जीवन-यात्रा जनसेवा के प्रति पूर्ण समर्पण की कहानी है।
महाराष्ट्र और संपूर्ण भारत में व्यावसायिक व उच्च शिक्षा के परिदृश्य को बदलने में डॉ. डी. वाई. पाटिल जी की भूमिका ऐतिहासिक रही है। 1980 के दशक में, जब युवाओं के लिए मेडिकल, इंजीनियरिंग और तकनीकी शिक्षा के अवसर अत्यंत सीमित थे, तब उन्होंने निजी भागीदारी के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के नए द्वार खोले।
नवी मुंबई, पुणे और कोल्हापुर में उनके द्वारा स्थापित ‘डी. वाई. पाटिल समूह’ के तहत आज 150 से अधिक शैक्षणिक और अनुसंधान संस्थान कार्यरत हैं। इन संस्थानों ने न केवल लाखों विद्यार्थियों के सपनों को पंख दिए, बल्कि भारत को कुशल डॉक्टर, इंजीनियर, शोधकर्ता और नेतृत्वकर्ता प्रदान किए। शिक्षा के क्षेत्र में उनके इस अतुलनीय योगदान के कारण ही उन्हें आदरपूर्वक ‘शिक्षा महर्षि’ के रूप में याद किया जाता है।
डॉ. डी. वाई. पाटिल का व्यक्तित्व केवल उनकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उनकी सहज सादगी और मानवीय संवेदनाओं से परिभाषित होता था। वे जिस किसी कार्य को हाथ में लेते, उसे दीर्घकालिक दृष्टिकोण के साथ पूरा करते थे। नवी मुंबई में अंतरराष्ट्रीय स्तर के ‘डी. वाई. पाटिल स्पोर्ट्स स्टेडियम’ का निर्माण उनके इसी दूरदर्शी सोच का प्रतीक है, जिसने भारत में खेल अवसंरचना को एक नई पहचान दी।
राजनीतिक जीवन में 1957 में नगरसेवक बनने से लेकर विधायक और राज्यपाल के पद तक पहुँचने के बावजूद, वे कभी आम जनता से दूर नहीं हुए। उनका द्वार हमेशा जरूरतमंदों के लिए खुला रहता था। शिक्षा के साथ-साथ उन्होंने स्वास्थ्य सुविधाओं को भी आम जनमानस तक पहुँचाया। उनके शैक्षणिक संस्थानों से संबद्ध हस्पतालों में हजारों गरीब और वंचित परिवारों को सस्ती व गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सेवा प्रदान की जाती है।
एक राज्यपाल के रूप में, उन्होंने त्रिपुरा, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में विश्वविद्यालयों के शैक्षणिक सुधारों और प्रशासनिक पारदर्शिता को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका मानना था कि किसी भी राष्ट्र की असली ताकत उसकी युवा पीढ़ी के बौद्धिक और नैतिक उत्थान में निहित है।
राष्ट्र निर्माण, शिक्षा, स्वास्थ्य और समाज कल्याण में उनके इस असाधारण योगदान को रेखांकित करते हुए भारत सरकार ने 1991 में उन्हें ‘पद्मश्री’ से अलंकृत किया। डॉ. डी. वाई. पाटिल जी भले ही आज हमारे बीच न हों, लेकिन उनके द्वारा स्थापित मूल्य, शैक्षणिक संस्थान और जनसेवा का उनका विजन हमेशा जीवित रहेगा। उन्होंने सिखाया कि सफलता का सही मापदंड यह है कि आप समाज के अंतिम व्यक्ति के जीवन में कितना सकारात्मक बदलाव ला पाते हैं।
उनका जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए कर्तव्यनिष्ठा, राष्ट्र-प्रेम और निरंतर कर्मयोग का प्रकाशपुंज बना रहेगा। भारत के इस महान सपूत और शिक्षा महर्षि को शत-शत नमन!

