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महाराष्ट्र भूमिसंपादकीयनए भारत का नया चेहरा: ‘(Gen Z)’
नए भारत का नया चेहरा: ‘(Gen Z)’

नए भारत का नया चेहरा: ‘(Gen Z)’

अर्चना त्रिपाठी

आज भारत दुनिया का सबसे युवा देश है, और इस युवा आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा ‘जेन जी’ का है। यह भारत की पहली ऐसी पीढ़ी है जो पूरी तरह से डिजिटल युग, स्मार्टफोन और हाई-स्पीड इंटरनेट के साये में बड़ी हुई है। इस पीढ़ी ने न तो उदारीकरण से पहले का दौर देखा है और न ही भौतिक अभावों का वह संघर्ष, जिसने इनकी पिछली पीढ़ियों की सोच को गढ़ा था। यही कारण है कि आज भारत का ‘जेन जी’ वर्ग देश के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक ढांचे को एक नई परिभाषा दे रहा है। उनकी आकांक्षाएं, उनके सपने और जीवन को देखने का उनका नजरिया पुरानी पीढ़ियों से बुनियादी तौर पर अलग है।

इस पीढ़ी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे पारंपरिक बंधनों और घिसे-पिटे पैमानों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं। करियर के मोर्चे पर जहां पिछली पीढ़ियां सरकारी नौकरियों या कॉर्पोरेट के सुरक्षित घेरे को प्राथमिकता देती थीं, वहीं ‘जेन जी’ स्वतंत्रता, रचनात्मकता और सार्थकता की तलाश में है। वे केवल ‘जीविका’ के लिए काम नहीं करना चाहते; वे एक ऐसा कार्य-संस्कृति चाहते हैं जो उनके मानसिक स्वास्थ्य का सम्मान करे। यही वजह है कि आज का युवा स्टार्टअप, कंटेंट क्रिएशन, फ्रीलांसिंग और ‘गिग इकोनॉमी’ में अपना भविष्य तलाश रहा है। वे जोखिम लेने से नहीं डरते, और यही साहस भारत में नए व्यावसायिक प्रयोगों को जन्म दे रहा है।

‘जेन जी’ को अक्सर सोशल मीडिया और रील्स की आभासी दुनिया में खोई हुई पीढ़ी मानकर खारिज कर दिया जाता है, लेकिन यह एक बहुत ही सतही मूल्यांकन है। सच यह है कि सामाजिक और वैश्विक मुद्दों पर इस पीढ़ी जैसी स्पष्टता, संवेदनशीलता और मुखरता पहले कभी नहीं देखी गई।

यह पीढ़ी एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहती है जो अधिक समावेशी, पारदर्शी और रूढ़ियों से मुक्त हो। लैंगिक समानता, पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और मानसिक स्वास्थ्य जैसे विषयों पर ‘जेन जी’ का रुख बेहद स्पष्ट और गंभीर है। वे उन ब्रांड्स, संस्थाओं और यहां तक कि राजनेताओं को भी पसंद नहीं करते जो केवल खोखले वादे करते हैं; वे प्रामाणिकता और जमीनी बदलाव के पक्षधर हैं। उपभोक्ता के तौर पर भी उनका व्यवहार बाजार को बदल रहा है—वे टिकाऊ और पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों को प्राथमिकता दे रहे हैं।

हालांकि, इस डिजिटल क्रांति के अपने खतरे भी हैं। अत्यधिक सूचनाओं के बोझ और सोशल मीडिया पर ‘परफेक्ट लाइफ’ दिखाने की होड़ ने इस पीढ़ी में अकेलेपन, एंग्जायटी और ‘फोमो’ जैसी समस्याओं को भी बढ़ाया है। त्वरित परिणाम की चाह कभी-कभी उनके धैर्य की परीक्षा लेती है। इसके बावजूद, उनकी त्वरित निर्णय लेने की क्षमता और किसी भी समस्या का डिजिटल समाधान ढूंढ निकालने का हुनर अद्वितीय है।

भारत के नीति-निर्माताओं, कॉर्पोरेट जगत और विचारकों को यह समझना होगा कि ‘जेन जी’ को केवल एक बड़े ‘वोट बैंक’ या ‘उपभोक्ता बाजार’ के रूप में देखना भारी भूल होगी। वे नए भारत के शिल्पकार हैं। यदि हमें देश के जनसांख्यिकीय लाभांश का सही लाभ उठाना है, तो हमें इस पीढ़ी की आकांक्षाओं को समझना होगा, उन्हें सही दिशा देनी होगी और उनके लिए एक ऐसा माहौल तैयार करना होगा जहां उनकी रचनात्मकता को संकीर्ण दायरों में न बांधा जाए। ‘जेन जी’ अपनी शर्तों पर इतिहास लिखने के लिए तैयार है, और देश का भविष्य इसी बात पर निर्भर करेगा कि हम उनकी इस ऊर्जा का कितना सही उपयोग कर पाते हैं।

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