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महाराष्ट्र भूमिसंपादकीयआत्मा को झकझोरती बर्बरता—मासूमियत का कत्ल और समाज की सामूहिक चुप्पी
आत्मा को झकझोरती बर्बरता—मासूमियत का कत्ल और समाज की सामूहिक चुप्पी

आत्मा को झकझोरती बर्बरता—मासूमियत का कत्ल और समाज की सामूहिक चुप्पी

अर्चना त्रिपाठी
आज जब हम खुद को आधुनिक, शिक्षित और सभ्य समाज का हिस्सा कहते हैं, तब अखबार के पन्ने और सूचना माध्यमों से छनकर आने वाली खबरें हमारी इस तथाकथित सभ्यता के मुंह पर करारा तमाचा जड़ देती हैं। राजस्थान के श्रीगंगानगर में एक महज बारह साल की बच्ची के साथ जो हुआ, और पश्चिम बंगाल के बारुईपुर में जिस तरह एक किशोरी की अस्मत लूटकर उसे जिंदा बोरे में बंद कर तालाब में डुबो दिया गया, उसने पूरे देश की आत्मा को लहूलुहान कर दिया है। बारह साल की उम्र… यह वो उम्र होती है जब बच्चों के हाथों में खिलौने और किताबें होनी चाहिए, जब उनके सपनों की उड़ान तितलियों जैसी मासूम होती है। लेकिन हवस के अंधे भेड़ियों ने उस नन्ही सी जान को चार दिनों तक बंधक बनाकर, दो दर्जन दरिंदों के बीच नोंचा। इस क्रूरता को सोचकर भी रूह कांप जाती है, धड़कनें थमने लगती हैं और आंखें आंसुओं से भर जाती हैं। क्या वाकई हम इंसानों की बस्ती में रह रहे हैं?

इस चीख को सिर्फ एक अपराध की खबर मानकर नहीं छोड़ा जा सकता, यह हमारे नैतिक पतन की चरम पराकाष्ठा है। जनाक्रोश के बाद प्रशासन ने गिरफ्तारियां कीं, उन होटलों को जमींदोज भी कर दिया जहां उस मासूम की चीखों को दबाया गया था, लेकिन क्या उन कंक्रीट की दीवारों को गिरा देने से उस बच्ची की आत्मा पर लगे गहरे जख्म कभी भर पाएंगे? वह मासूम शायद जीवनभर इस खौफनाक त्रासदी के साये से कभी उबर नहीं पाएगी। इस इंटरनेट और सोशल मीडिया की आभासी दुनिया ने हमारे बच्चों को ऐसा सम्मोहित कर दिया है कि उन्हें त्याग-तपस्या से पालने वाले मां-बाप पराए और स्क्रीन पर दिखने वाले चेहरे अपने लगने लगे हैं। इंस्टाग्राम के एक तथाकथित दोस्त से मिलने निकली वह बच्ची जब अपनों से दूर हुई, तो गिद्धों की तरह घात लगाए बैठे समाज के ठेकेदारों ने उसकी बेबसी का फायदा उठाया। एक रिक्शेवाले के झांसे में आकर वह उस नर्क में पहुंच गई, जहां से उसकी रूह को तार-तार कर दिया गया।

यह समय केवल मोमबत्तियां जलाने, सड़कों पर मशाल जुलूस निकालने या पुलिस-प्रशासन को कोसने का नहीं है। यह समय हर माता-पिता, हर स्कूल, हर परिवार और पूरे समाज के लिए आत्ममंथन करने का है। हम अपनी बेटियों को संस्कार तो देते हैं, लेकिन उन्हें इस बेरहम दुनिया के छिपे हुए दानवों को पहचानना क्यों नहीं सिखाते? पुलिस तंत्र, चाइल्ड वेलफेयर संस्थाएं और पॉक्सो एक्ट जैसे सख्त कानूनों को अब कागजों से निकलकर नई पीढ़ी की चुनौतियों के अनुरूप और अधिक कठोर होना होगा। अगर आज भी हम केवल मूकदर्शक बने रहे, इंटरनेट पर परोसी जा रही इस यौन स्वच्छंदता की आंधी में अपनी सांस्कृतिक शुचिता को बहते देखते रहे, तो हम सब इस अपराध के बराबर के भागीदार होंगे। बेटियों की सुरक्षा केवल कानून का विषय नहीं, हमारे अस्तित्व की रक्षा का सवाल है। यदि अब भी सामूहिक चेतना नहीं जागी, तो इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा और हम हर दिन अपनी किसी न किसी बेटी की मासूमियत का जनाजा उठते देखने को अभिशप्त रहेंगे।

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