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महाराष्ट्र भूमिसंपादकीयसंपादकीय: मुनाफे की मंडी में ज़हरीली थाली — क्या यह मिलावट हमारे भविष्य के लिए खतरे की घंटी है?
संपादकीय: मुनाफे की मंडी में ज़हरीली थाली — क्या यह मिलावट हमारे भविष्य के लिए खतरे की घंटी है?

संपादकीय: मुनाफे की मंडी में ज़हरीली थाली — क्या यह मिलावट हमारे भविष्य के लिए खतरे की घंटी है?

अर्चना त्रिपाठी

जब प्रशासनिक हलकों में ‘तुकाराम मुंढे’ नाम के किसी अधिकारी की एंट्री होती है, तो अमूमन दो चीजें तय मानी जाती हैं—पहली, नियमों का सख्ती से पालन और दूसरी, भ्रष्ट व मिलावटखोर तत्वों के बीच हड़कंप। हाल ही में बाजार में मिलावटी और दूषित खाद्य पदार्थों के खिलाफ खाद्य एवं औषधि प्रशासन के आयुक्त तुकाराम मुंढे द्वारा शुरू की गई ताबड़तोड़ कार्रवाई ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जब इरादे मजबूत हों, तो कानून के हाथ दोषियों की गर्दन तक पहुँचने में देर नहीं लगाते।

बाजार में मिलावटी और दूषित खाद्य पदार्थों के खिलाफ प्रशासनिक तंत्र और सजग अधिकारियों का यह कड़ा प्रहार सिर्फ एक कानूनी एक्शन नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर आम जनता की थाली पर मंडराते संकट को उजागर करता है। त्योहारों का सीजन हो या आम दिन, दूध, मावा, खाद्य तेल, मसालों से लेकर रोज़मर्रा की सब्जियों तक में जिस तरह केमिकल और घातक पदार्थों की मिलावट की खबरें सामने आती हैं, वह बेहद डरावनी हैं। यह कार्रवाई सिर्फ एक सरकारी अभियान नहीं, बल्कि हम सभी के लिए ‘खतरे की सबसे बड़ी घंटी’ है।

सवाल यह उठता है कि क्या हम जो खा रहे हैं, वह पोषण है या Slow Poison? आज चंद रुपयों के अधिक मुनाफे के लिए मिलावटखोर इंसानी जिंदगियों और मासूम बच्चों के स्वास्थ्य के साथ खुलेआम खिलवाड़ कर रहे हैं। यूरिया और डिटर्जेंट मिला दूध, सिंथेटिक मावा, मसालों में लकड़ी का बुरादा या हानिकारक रंग, और फलों-सब्जियों को जल्दी पकाने के लिए घातक रसायनों का इस्तेमाल—यह सब कुछ हमारी रसोई तक पहुँच रहा है। ऐसे में जब कोई प्रशासनिक दस्ता इन मिलावटखोरों की फैक्ट्रियों और गोदामों पर छापा मारता है, तो बाजार के पीछे छिपा यह कड़वा सच पूरी तरह से बेनकाब हो जाता है कि व्यापारिक नैतिकता का स्थान पूरी तरह से जानलेवा लालच ने ले लिया है।

लेकिन यह स्थिति सिर्फ मिलावटखोरों के हौसलों की कहानी नहीं कहती, बल्कि यह हमारे सिस्टम की सुस्ती और लचर निगरानी तंत्र पर भी एक बड़ा सवालिया निशान लगाती है। आखिर क्यों हर बार किसी ‘मुंढे’ जैसे कड़क अधिकारी के आने का इंतज़ार करना पड़ता है ताकि कानून अपनी ताकत दिखाए? नियमित जांच और फूड सेफ्टी ऑडिट्स हमारे सिस्टम का स्थायी हिस्सा क्यों नहीं बन पाते? जब तक अधिकारियों में इच्छाशक्ति की कमी रहेगी, तब तक मिलावट का यह काला कारोबार फलता-फूलता रहेगा। जैसे ही कोई सख्त अधिकारी हटता है, ये मिलावटखोर फिर से सक्रिय हो जाते हैं। इस चक्रव्यूह को तोड़ना आज बेहद जरूरी हो गया है।

इन दिनों एफडीए आयुक्त का मिलावटखोरों के खिलाफ यह वार इस बात की भी चेतावनी है कि अब जनता को केवल भाग्य के भरोसे या आकर्षक विज्ञापनों के चंगुल में नहीं फंसना चाहिए। उपभोक्ताओं के रूप में हमें खुद भी जागरूक होना होगा, घटिया या संदेहास्पद सामान के खिलाफ आवाज उठानी होगी और जिम्मेदार नागरिकों की तरह प्रशासन का साथ देना होगा।

बाजार की इस गंदगी पर किया गया यह प्रहार एक स्वागत योग्य और अनुकरणीय कदम है। जब तक मिलावटखोरों के मन में मकोका कानून के तहत सजा पाने और जेल जाने का यह डर स्थायी नहीं होगा, तब तक हमारी थाली सुरक्षित नहीं होगी। तुकाराम मुंढे ने कार्रवाई की शुरुआत करके सभी के लिए “खतरे की घंटी बजा दी है”; अब देखना यह है कि पूरा प्रशासनिक तंत्र और हमारा समाज इस चेतावनी से जागता है या फिर से किसी बड़े हादसे के इंतज़ार में गहरी नींद सो जाता है।

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