मोनिका भोसले
हर साल जून-जुलाई की दस्तक के साथ ही देश की आर्थिक राजधानी मुंबई की रफ्तार पर ‘रेड अलर्ट’ का पहरा लग जाता है। इस बार भी मानसून की पहली मूसलाधार बारिश ने मायानगरी को जिस बेरहमी से घुटनों पर ला दिया है, उसने एक बार फिर हमारे पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सड़कों का समंदर बनना, लोकल ट्रेनों के पहियों का पूरी तरह थम जाना, हवाई उड़ानों में देरी और सबसे दर्दनाक—निचली बस्तियों और झोपड़पट्टियों में रहने वाले गरीबों के घरों के भीतर तक गंदे पानी का भर जाना। यह हर साल की वही पुरानी, घिसी-पिटी और खौफनाक कहानी है, जो मुंबई की नियति बना दी गई है। लेकिन सबसे बड़ा और तीखा सवाल यह है कि आखिर कब तक मुंबईकर इस ‘वार्षिक त्रासदी’ को अपनी किस्मत मानकर सहते रहेंगे और कब तक प्रशासन अपनी नाकामियों को ‘कुदरत का कहर’ कहकर पल्ला झाड़ता रहेगा?
मौसम विभाग की यह दलील तकनीकी रूप से सही हो सकती है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अब बेहद कम समय में अत्यधिक बारिश की घटनाएं बढ़ी हैं। जब आसमान से बरसती आफत और समंदर में उठने वाला हाई टाइड एक साथ मिलते हैं, तो ड्रेनेज व्यवस्था लाचार हो जाती है। लेकिन क्या हम हर बार सारा दोष बादलों और समंदर पर मढ़कर अपनी प्रशासनिक और राजनीतिक जिम्मेदारियों से भाग सकते हैं? सच्चाई यह है कि मुंबई का यह ‘कोहराम’ प्राकृतिक से कहीं ज्यादा प्रशासनिक और ढांचागत विफलता का जीवंत प्रमाण है। ब्रिटिश काल के पुराने पड़ चुके ड्रेनेज सिस्टम पर आज की इस विशाल आबादी का भारी बोझ है, और बीआरआईएमएसटीओडब्ल्यूएडी (BRIMSTOWAD) जैसे जल निकासी के बड़े प्रोजेक्ट्स दशकों बीत जाने के बाद भी फाइलों से बाहर निकलकर जमीन पर असर दिखाने में पूरी तरह नाकाम रहे हैं।
इस बदहाली की एक बड़ी वजह मुंबई का वह अनियोजित शहरीकरण है, जिसने कंक्रीट के इस जंगल में पानी सोखने वाली जमीन का नामोनिशान मिटा दिया है। मीठी नदी और शहर के अन्य प्राकृतिक नालों पर हुए अवैध निर्माण, मैंग्रोव की अंधाधुंध कटाई और प्लास्टिक कचरे की चोकिंग ने पानी की निकासी के सारे रास्ते बंद कर दिए हैं। इसके ऊपर से मानसून से ठीक पहले हर साल करोड़ों रुपये के भारी-भरकम बजट से होने वाली ‘नाला सफाई’ के दावों की पोल, मानसून की पहली ही मूसलाधार बारिश पूरी तरह खोल देती है। अधिकारियों और ठेकेदारों की कागजी मुस्तैदी का खामियाजा अंततः शहर की उस आम जनता को भुगतना पड़ता है जो कमर तक भरे गंदे पानी में चलने को मजबूर है।
मुंबई की असली ताकत इसकी ‘लोकल ट्रेनें’ और वे आम कामकाजी लोग हैं, जो इस घोर अव्यवस्था के बीच भी सिर्फ इसलिए आगे बढ़ते हैं क्योंकि उन्हें ‘मुंबई स्पिरिट’ का एक झूठा और चालाकी भरा तमगा थमा दिया गया है। लेकिन इस तथाकथित ‘स्पिरिट’ की आड़ में आम नागरिकों की बेबसी और व्यवस्था की घोर लापरवाही को अब और छुपाया नहीं जा सकता। जब महज कुछ घंटों की बारिश में देश के सबसे अमीर महानगर की रफ्तार थम जाती है, करोड़ों की आर्थिक क्षति होती है और सबसे ज्यादा मार दिहाड़ी मजदूरों, छोटे व्यापारियों तथा नौकरीपेशा वर्ग पर पड़ती है, तो यह मौजूदा नगर नियोजन पर एक बड़ा सवालिया निशान है।
अब समय आ गया है कि प्रशासन केवल तात्कालिक राहत, एनडीआरएफ की तैनाती और आपदा प्रबंधन की बैठकों के भरोसे बैठना पूरी तरह छोड़ दे। मुंबई को अब तात्कालिक पैचवर्क या राजनीतिक बयानों की नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक विजन और कड़ी राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। जब तक नगर पालिका, राज्य सरकार और नगर नियोजक मिलकर जलभराव वाले संवेदनशील इलाकों का कोई स्थायी और आधुनिक वैज्ञानिक समाधान नहीं ढूंढते, तब तक मुंबई हर साल यूं ही डूबती रहेगी। मुंबईकरों को भारी-भरकम टैक्स चुकाने के बदले ‘साहस का सर्टिफिकेट’ नहीं, बल्कि एक सुरक्षित, सुचारू और सम्मानजनक बुनियादी ढांचा चाहिए। मानसून कुदरत का आशीर्वाद है, इसे सालाना कोहराम में बदल देना पूरी तरह से एक प्रशासनिक और इंसानी नाकामी है।

