अर्चना त्रिपाठी
भारतीय राजनीति के इतिहास में ‘इस्तीफा’ कभी आत्म-मंथन, आत्म-ग्लानि और सर्वोच्च राजनीतिक नैतिकता का प्रतीक हुआ करता था। लेकिन आज के दौर में जब किसी बड़े नेता या मंत्री के त्यागपत्र की खबर आती है, तो आम नागरिक के मन में पहला सवाल यही उठता है—क्या यह वाकई नैतिकता का तकाजा है या महज पर्दे के पीछे रचा गया कोई नया राजनीतिक स्वांग?
इतिहास के पन्नों को पलटें तो 1956 में अराियालूर रेल हादसे के बाद तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री का इस्तीफा नैतिकता की उस मिसाल के रूप में याद किया जाता है, जहाँ पद से बड़ा दर्जा जिम्मेदारी को दिया गया था। 1950 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने वैचारिक मतभेदों के चलते केंद्रीय मंत्रिमंडल छोड़ा था। वे ऐसे दौर थे जब राजनेता किसी नाकामी, दुर्घटना या नीतिगत विफलता का दोष दूसरों पर मढ़ने के बजाय उसकी नैतिक जिम्मेदारी खुद अपने कंधों पर लेते थे।
लेकिन समय के साथ लोकतंत्र का यह उदात्त आदर्श पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका है। आज की राजनीति में ‘इस्तीफा’ स्वेच्छा का विषय नहीं रहा, बल्कि यह विशुद्ध रूप से एक ‘इवेंट मैनेजमेंट’ और ‘डैमेज कंट्रोल’ का साधन बन गया है।
जब भी कोई बड़ा घोटाला, प्रशासनिक नाकामी, पेपर लीक या भीषण हादसा होता है, तो सबसे पहले लीपापोती की कोशिश की जाती है। जब पानी सिर से ऊपर गुजरने लगता है, जनता का आक्रोश सड़कों और सोशल मीडिया पर फूट पड़ता है, और चुनाव में नुकसान की आशंका मंडराने लगती है—तब जाकर किसी एक मोहरे की बली दी जाती है। इस प्रक्रिया को लोक-लाज का ढोंग बनाए रखने के लिए “व्यक्तिगत कारणों” या “स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं” का आवरण पहना दिया जाता है।
विडंबना देखिए कि आज किसी मंत्री या अधिकारी का इस्तीफा किसी गलती के प्रायश्चित का साधन नहीं, बल्कि एक ‘सेफ एक्जिट’ बन चुका है। एक व्यक्ति से इस्तीफा दिलवाकर पूरी व्यवस्था खुद को दोषमुक्त घोषित कर देती है। मानो एक कुर्सी खाली होते ही सारे अपराध धुुल गए हों और पीड़ित जनता को न्याय मिल गया हो।
आज का कड़वा सच यही है कि अब बिना जनांदोलन, अदालती फटकार या राजनीतिक दबाव के कोई अपनी मर्जी से कुर्सी का मोह नहीं छोड़ता। ‘नैतिक जिम्मेदारी’ शब्द अब केवल राजनीतिक भाषणों और घोषणापत्रों की शोभा बढ़ाने तक सीमित रह गया है।
अगर लोकतंत्र को अपनी खोई हुई साख बहाल करनी है, तो राजनीति में इस्तीफों को केवल एक रणनीतिक मुखौटा बनने से रोकना होगा। जनता को यह समझना होगा कि किसी का पद छोड़ना समस्या का अंत नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने की शुरुआत होनी चाहिए। जब तक इस्तीफे के साथ-साथ संस्थागत सुधार और दोषियों पर कठोर कानूनी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक ‘इस्तीफा’ केवल सत्ता बचाने का एक सस्ता नाटक ही बना रहेगा।

