अर्चना त्रिपाठी
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया का मूल धर्म है—’अंतिम व्यक्ति की आवाज बनना और सत्ता से बेखौफ सवाल करना।’ लेकिन एक लंबा दौर ऐसा रहा है जहाँ यह ‘आवाज’ और ‘सवाल’ तय करने वाले नेतृत्व में लैंगिक असमानता की गहरी खाई रही है। न्यूज़ रूम के फैसलों से लेकर जमीनी स्तर की खोजी पत्रकारिता तक, नीति-निर्धारण के शीर्ष पदों पर महिलाओं की उपस्थिति को अक्सर सीमित रखा गया। परंतु आज परिदृश्य बदल रहा है। यह बदलाव केवल संख्यात्मक नहीं है, बल्कि यह पत्रकारिता के दृष्टिकोण, प्राथमिकताओं और उसकी आत्मा का कायाकल्प है।
अक्सर कहा जाता है कि पत्रकारिता समाज का आईना होती है। लेकिन यदि उस आईने को बनाने और सँवारने में आधी आबादी की दृष्टि ही शामिल न हो, तो वह अक्स अधूरा रह जाता है। मुख्यधारा की पत्रकारिता में महिला नेतृत्व का उभार महज़ एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं है, यह सनसनीखेज खबरों के शोर के बीच ‘सरोकार की पत्रकारिता’ की वापसी है। महिला नेतृत्व वाले मीडिया संस्थान या न्यूज़ रूम न केवल खबरों के चयन में अधिक संवेदनशील होते हैं, बल्कि वे उन मुद्दों को मुख्यधारा में लाते हैं जिन्हें अक्सर ‘सॉफ्ट न्यूज़’ कहकर हाशिए पर धकेल दिया जाता था—जैसे कि स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही, महिला अधिकार, स्वास्थ्य, शिक्षा और पर्यावरण।
“जब एक महिला पत्रकारिता के शीर्ष पद पर बैठती है, तो वह केवल एक संस्थान नहीं चलाती; वह खबरों की परिभाषा को अधिक मानवीय, पारदर्शी और समावेशी बनाती है।”
आज की पत्रकारिता जिस दौर से गुजर रही है, वहाँ विश्वसनीयता सबसे बड़ा संकट है। ‘क्लिकबैट’ और टीआरपी की अंधी दौड़ में जब मीडिया की साख डगमगा रही है, तब महिला नेतृत्व वाले प्रयास पारदर्शी और जिम्मेदार पत्रकारिता का एक नया प्रतिमान स्थापित कर रहे हैं।
बेशक, यह राह कांटों भरी है। डिजिटल युग में महिला पत्रकारों और संपादकों को न केवल फील्ड की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, बल्कि उन्हें ऑनलाइन ट्रोलिंग, मानसिक प्रताड़ना और पूर्वाग्रहों से भी लड़ना पड़ता है। इसके बावजूद, वे डरने या पीछे हटने के बजाय और अधिक प्रखर होकर उभर रही हैं। स्थानीय मनपा चुनाव से लेकर राष्ट्रीय राजनीति की नीति-मेकिंग तक, हर उस जगह महिला नेतृत्व की पैनी नजर है जहाँ जनता का हित जुड़ा है।
अब समय आ गया है कि इस बदलाव को केवल एक अपवाद या ‘सराहनीय प्रयास’ के रूप में देखना बंद किया जाए। महिला नेतृत्व आज की मुख्यधारा की पत्रकारिता की अनिवार्य जरूरत बन चुका है। यह लोकतंत्र को अधिक जीवंत और पारदर्शी बनाने का सशक्त माध्यम है। जब पत्रकारिता में महिलाओं के हाथ में कलम और कमान दोनों होती हैं, तब सत्ता की जवाबदेही भी तय होती है और समाज को एक नई, निष्पक्ष और गूंजती हुई ‘आवाज’ मिलती है।

