मोनिका भोसले
भारतीय रंगमंच और सिनेमा के इतिहास में कुछ नाम ऐसे होते हैं जो केवल एक कलाकार या निर्देशक के रूप में नहीं, बल्कि एक पूरी संस्था के रूप में याद किए जाते हैं। दिग्दर्शिका स्व.विजया मेहता एक ऐसा ही देदीप्यमान नाम हैं, जिन्होंने थियेटर को महज मनोरंजन का साधन न मानकर उसे समाज का आईना और मानवीय संवेदनाओं को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम बनाया। मराठी रंगभूमि से लेकर भारतीय सिनेमा के क्षितिज तक, उनकी कलात्मक यात्रा कला के प्रति अटूट समर्पण, अनुशासन और एक दूरदर्शी सोच की अनूठी मिसाल है।
➤ प्रयोगधर्मिता और ‘रंगायन’ का स्वर्णिम दौर
स्व.विजया मेहता के योगदान को समझने के लिए हमें उस दौर में जाना होगा जब भारतीय रंगमंच पारंपरिक ढर्रे से निकलकर नए प्रयोगों की ओर कदम बढ़ा रहा था। उन्होंने विजय तेंदुलकर, सुलभा देशपांडे और अरविंद देशपांडे जैसे दिग्गजों के साथ मिलकर ‘रंगायन’ संस्था की नींव रखी। रंगायन ने न केवल मराठी नाटकों को एक नई दिशा दी, बल्कि प्रयोगधर्मिता का एक ऐसा दौर शुरू किया जिसने क्षेत्रीय कला को वैश्विक पहचान दिलाई। विजया बाई की सबसे बड़ी ताकत थी उनकी पटकथा को गहराई से समझने की कला और कलाकारों से उनका सर्वश्रेष्ठ अभिनय बाहर निकलवाने का अद्भुत हुनर।
➤ वैश्विक सोच और भारतीय संस्कृति का समन्वय
उनकी निर्देशन शैली की एक और बड़ी खासियत थी पाश्चात्य और भारतीय नाट्य विधाओं का अनूठा समन्वय। उन्होंने प्रसिद्ध जर्मन नाटककार बर्टोल्ट ब्रेख्त की जटिल नाट्य शैली को भारतीय परिवेश में इस तरह ढाला कि वह आम दर्शकों के दिलों में उतर गई। उनका नाटक ‘अजब न्याय वर्तुळाचा’ इसका एक बेहतरीन उदाहरण है। इसके साथ ही, सी. टी. खानोलकर के ‘एक शून्य बाजीराव’ और महेश एलकुंचवार के ‘वाडा चिरेबंदी’ जैसे कालजयी नाटकों के जरिए उन्होंने पारिवारिक बिखरते रिश्तों और मानवीय मनोविज्ञान की परतों को जिस शिद्दत से मंच पर उतारा, वह आज भी नए निर्देशकों के लिए एक गाइड की तरह है।
➤ रंगमंच से रुपहले पर्दे तक का सफर
स्व.विजया मेहता ने जब सिनेमा और टेलीविजन का रुख किया, तो वहां भी अपनी गहरी छाप छोड़ी। ‘पेस्तनजी’ और ‘रावसाहेब’ जैसी समीक्षकों द्वारा सराही गई फिल्मों के माध्यम से उन्होंने बदलते समय, समाज की रूढ़ियों और इंसानी मन के अंतर्द्वंद्व को बेहद बारीकी से पर्दे पर दिखाया। उनकी फिल्मों में भी थियेटर जैसी ही एक खास शिष्टता, ठहराव और गहरी कलात्मकता साफ झलकती थी।
➤ एक समृद्ध विरासत और प्रेरणा
स्व.विजया मेहता की असली पूंजी उनके द्वारा तैयार की गई कलाकारों की वह पीढ़ी है, जो आज भारतीय सिनेमा और थियेटर का नेतृत्व कर रही है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन्होंने भारतीय रंगमंच का गौरव बढ़ाया। संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्मश्री और तन्वीर सन्मान जैसे प्रतिष्ठित सम्मानों से विभूषित स्व.विजया मेहता आज भी हर उस रंगकर्मी के लिए वे प्रेरणास्रोत हैं, जो कला को एक साधना मानती है। उनका काम हमें याद दिलाता है कि तकनीक और प्रस्तुति के तरीके चाहे कितने भी बदल जाएं, रंगमंच की आत्मा हमेशा उसके अध्ययन, सादगी और कला के प्रति वफादारी में ही बसती है।

