मोनिका भोसले
मुंबई की आत्मा उसके समुद्र तटों, आरे के हरे-भरे जंगलों और तटीय मैंग्रोव्स में बसती है। लेकिन बीते कुछ दशकों में ‘विकास’ और ‘आधुनिकीकरण’ की तेज अंधी दौड़ ने देश की इस आर्थिक राजधानी को एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है, जहां हर नई बुनियादी ढांचा परियोजना के साथ एक नया पर्यावरणीय संकट खड़ा हो जाता है। कोस्टल रोड, मेट्रो नेटवर्क, फ्लाईओवर्स और गगनचुंबी इमारतों के री-डेवलपमेंट ने निस्संदेह मुंबईकरों के परिवहन और जीवन को रफ्तार दी है, लेकिन इसकी भारी कीमत शहर के पर्यावरण और जनस्वास्थ्य को चुकानी पड़ रही है।
मुंबई में बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के नाम पर बीते वर्षों में हजारों पुराने और छायादार पेड़ों की बलि दी गई है। इसके परिणामस्वरूप शहर में ‘अर्बन हीट आइलैंड’ का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। खुले मैदानों, मिट्टी और हरियाली की जगह लेती कंक्रीट की सड़कें और कांच की इमारतें सूरज की गर्मी को सोख लेती हैं, जिससे मुंबई का औसतन तापमान और उमस का स्तर साल-दर-साल खतरनाक सीमा को छू रहा है।
जो मुंबई कभी अपनी समुद्री हवाओं के कारण वायु प्रदूषण से बची रहती थी, आज वही शहर सर्दियों और मानसून के आसपास खराब एयर क्वालिटी इंडेक्स से जूझता नजर आता है। निर्माण स्थलों से उड़ती धूल, वाहनों का अंतहीन धुआं और घटता ‘ग्रीन कवर’ मुंबईकरों को फेफड़ों और सांस की बीमारियों की ओर धकेल रहा है।
दूसरी ओर, तटीय विकास और समुद्र में कचरा बहाए जाने से समुद्री जीवन और स्थानीय मछुआरों की आजीविका पर भी गहरा असर पड़ा है। ‘विकास’ की यह परिभाषा कितनी समावेशी है, जब यह शहर के मूल निवासियों और उसकी प्राकृतिक धरोहर को ही दांव पर लगा दे?
इसमें कोई दो राय नहीं कि एक अंतरराष्ट्रीय मेट्रोपॉलिटन शहर के रूप में मुंबई को आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर की सख्त जरूरत है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या विकास और पर्यावरण संरक्षण दोनों एक साथ नहीं चल सकते?
आज मुंबई को ‘अनियंत्रित कंक्रीटीकरण’ के बजाय ‘सस्टेनेबल अर्बन प्लानिंग’ की सख्त जरूरत है। किसी भी बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना को हरी झंडी देने से पहले उसके दूरगामी पर्यावरणीय प्रभावों का पारदर्शी मूल्यांकन होना चाहिए। इमारतों और सड़कों के निर्माण में ग्रीन रूफ्स, वर्टिकल गार्डन्स, और ‘परमिएबल पेवमेंट्स’ जैसे आधुनिक और पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों को अनिवार्य किया जाना चाहिए ।
मुंबई सिर्फ कंक्रीट और लोहे का ढांचा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की उम्मीदों और सांसों से धड़कता एक जीवंत शहर है। यदि हमने केवल आर्थिक लाभ और त्वरित विकास को ही प्राथमिकता दी, तो वह दिन दूर नहीं जब यह शहर प्राकृतिक आपदाओं और दमघोंटू प्रदूषण के बोझ तले दब जाएगा। प्रशासन, मनपा और आम नागरिकों को यह समझना होगा कि विकास का वास्तविक अर्थ जीवन की गुणवत्ता में सुधार है, न कि जीवन के आधार (पर्यावरण) को ही नष्ट कर देना। समय आ गया है कि मुंबई के लिए एक ऐसा संतुलन साधा जाए, जहां प्रगति की रफ्तार भी हो और प्रकृति की सांसें भी सुरक्षित रहें।

