अर्चना त्रिपाठी
भारतीय राजनीति की प्रयोगशाला में जब भी कोई बड़ा बदलाव होता है, तो उसकी गूंज दूर तक सुनाई देती है। भाजपा के नवनियुक्त राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के नेतृत्व में हाल ही में घोषित नई राष्ट्रीय टीम महज एक सांगठनिक फेरबदल नहीं, बल्कि वर्ष २०२९ के आम चुनावों और आगामी सियासी रणक्षेत्र को साधने के लिए बिछाई गई एक सोची-समझी राजनीतिक बिसात है। इस फेरबदल ने साफ कर दिया है कि पार्टी अब ‘कम्फर्ट जोन’ की राजनीति से बाहर निकलकर विशुद्ध रूप से ‘परफॉर्मेंस’ और ‘मिशन मोड’ के एजेंडे पर काम कर रही है।
इस नई टीम का सबसे बड़ा आकर्षण कुछ कद्दावर और मंजे हुए चेहरों की धमाकेदार वापसी है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से आने वाले मजबूत वैचारिक स्तंभ राम माधव को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में वापस लाकर पार्टी ने अपनी रणनीतिक धार को और तेज कर दिया है। वहीं, आक्रामक तेवर वाली फायरब्रांड नेत्री और पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय महासचिव बनाकर केंद्रीय संगठन में एक बड़ी और प्रभावी जिम्मेदारी सौंपी है। इसके साथ ही, त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री बिप्लब कुमार देब को राष्ट्रीय महामंत्री बनाकर पार्टी ने पूर्वोत्तर भारत के सियासी समीकरणों को अपने पक्ष में मजबूती से साधने का संदेश दिया है।
इस फेरबदल को संगठन के भीतर एक बड़े राजनीतिक ‘ ऑपरेशन’ के रूप में देखा जा रहा है। राष्ट्रीय महासचिवों के स्तर पर की गई इस ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ में लंबे समय से संगठन में काबिज रहे अरुण सिंह, दुष्यंत गौतम, तरुण चुग और राधामोहन दास अग्रवाल जैसे चर्चित चेहरों को इस बार महासचिव पद की जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया गया है। हालांकि, पार्टी के दो सबसे भरोसेमंद और अचूक रणनीतिकार माने जाने वाले विनोद तावड़े और सुनील बंसल ने अपने पदों पर बरकरार रहकर यह साबित कर दिया है कि केंद्रीय नेतृत्व में उनकी उपयोगिता अभी भी सर्वोपरि है।
उपाध्यक्ष पद की बात करें तो वसुंधरा राजे, बैजयंत पांडा, तारिक मंसूर और रेखा वर्मा अपनी जगह बचाने में कामयाब रहे, लेकिन सरोज पांडेय, डी. के. अरुणा, एम. चुबा आओ, ए. पी. अब्दुल्लाकुट्टी, लक्ष्मीकांत वाजपेयी और लता उसेंडी जैसे सीनियर चेहरों को संगठन से बाहर का रास्ता दिखाकर साफ कर दिया गया है कि पद से ज्यादा पार्टी की भावी रणनीति प्राथमिकता है।
भाजपा की इस नई टीम का खाका इस बात की गवाही देता है कि पार्टी अब केवल पारंपरिक हिंदी भाषी क्षेत्रों के भरोसे बैठने वाली नहीं है। टीम में ४० प्रतिशत से अधिक सदस्यों को वंचित और पिछड़ा समाजों से शामिल करके पार्टी ने एक बड़ा और सधा हुआ सामाजिक दांव खेला है।
इसके अलावा, दक्षिण भारत के किले को भेदने के लिए आंध्र प्रदेश की डी. पुरंदेश्वरी को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और तमिलनाडु के एम. वेंकटेशन को राष्ट्रीय सचिव की जिम्मेदारी सौंपी गई है। यह कदम बताता है कि दक्षिण के मोर्चे पर भाजपा अब आक्रामक विस्तार की नीति पर काम कर रही है।
राजनीतिक गलियारों में इस नई टीम को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। एक तरफ जहां जमे-जमाए दिग्गजों की विदाई ने सियासी सुगबुगाहट बढ़ा दी है, वहीं दूसरी तरफ युवा और आक्रामक नेतृत्व को आगे लाकर भाजपा ने २०२९ के चुनावी रथ को अभी से गति दे दी है। यह बदलाव इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि भगवा खेमे में अब ‘टिकने’ से ज्यादा ‘परिणाम देने’ की संस्कृति को प्राथमिकता मिल रही है। आने वाले दिनों में यह नई टीम विपक्ष के हर सियासी वार का कितनी मजबूती से जवाब देती है, यह तो वक्त बताएगा, लेकिन इतना तय है कि भाजपा ने चुनावी बिसात बिछाते हुए अपनी चालें चल दी हैं।

