अर्चना त्रिपाठी
देश में कानून-व्यवस्था को ठेंगा दिखाकर अपने जुर्म की सल्तनत चलाने वाले आपराधिक गिरोहों का इतिहास कोई नया नहीं है। वक्त के साथ चेहरों के मुखौटे, गिरोहों के नाम और वारदातों के तरीके जरूर बदल गए, लेकिन खौफ का वो स्याह साया आज भी जस का तस मंडरा रहा है। एक दौर था जब मुंबई की गलियां हाजी मस्तान, दाऊद इब्राहिम और छोटे राजन के गैंगवार की गवाह बना करती थीं। ऐसा लगता है कि मायानगरी में अपराध का वह काला दौर एक बार फिर करवट ले रहा है। हाल में बॉलीवुड अभिनेता टाइगर श्रॉफ की गाड़ी पर हुई गोलीबारी की घटना इस बात का ताजा और खौफनाक सबूत है कि गैंगस्टर किस तरह कानून के पहरेदारों को खुली चुनौती दे रहे हैं।
सलमान खान से लेकर रोहित शेट्टी जैसे बड़े सितारे और निर्देशक पहले भी गैंगस्टरों की हिट लिस्ट में रहे हैं। यह सिलसिला दर्शाता है कि देश की आर्थिक राजधानी में संगठित अपराध आज भी पुलिस और प्रशासन के लिए एक बड़ी और सिरदर्दी बनी हुई चुनौती है। यह राहत की बात है कि मुंबई पुलिस की सटीक खुफिया इनपुट के आधार पर राजस्थान पुलिस ने कोटा रेलवे स्टेशन से तीन संदिग्ध हमलावरों को धर दबोचा। उम्मीद की जानी चाहिए कि इन गिरफ्तारियों से इस पूरे नेटवर्क की परतें खुलेंगी और साजिश की जड़ों तक पहुंचा जा सकेगा। मुंबई पुलिस के लिए यह कामयाबी इसलिए भी अहम है क्योंकि फिल्मी सितारों को डराने, धमकाने और जबरन वसूली (रंगदारी) का यह खेल अब हद से ज्यादा खतरनाक मोड़ ले चुका है।
शुरुआती तफ्तीश में इस हमले के तार लॉरेंस बिश्नोई गैंग के एक गुर्गे से जुड़ते दिख रहे हैं। सवाल यह उठता है कि साल 2015 से जेल की सलाखों के पीछे बंद लॉरेंस बिश्नोई का नाम हर बड़ी वारदात में आखिर कैसे तैरने लगता है? भारत की जेल में कैद होने के बावजूद उसका नेटवर्क यूरोप और अमेरिका तक फैला बताया जाता है। हाल ही में उसके करीबी करमवीर सिंह को कनाडा से डिपोर्ट किए जाने के बाद पंजाब पुलिस ने पकड़ा, तो वहीं उसके भाई अनमोल बिश्नोई को अमेरिका से डिपोर्ट करवाकर एनआईए (NIA) ने शिकंजे में लिया। यह साफ तौर पर संगठित अपराध और आतंकवाद (गैंगस्टर-टेरर नेटवर्क) के घातक गठजोड़ की ओर इशारा करता है।
टाइगर श्रॉफ पर हुआ हमला सार्वजनिक सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। अगर हमलावर मुंबई जैसे घने और अत्याधुनिक सर्विलांस वाले शहर में किसी हस्ती पर सरेआम गोलियां चलाकर दूसरे राज्य की सीमा में दाखिल हो जाते हैं, तो यह हमारी खुफिया तंत्र और सुरक्षा इंतजामों की पोल खोलता है।
अपराधियों के इस अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट को ध्वस्त करने के लिए सभी राज्यों की पुलिस एजेंसियों के बीच अटूट समन्वय और रीयल-टाइम इंटेलिजेंस शेयरिंग बेहद जरूरी है। सीमा पार बैठकर बेखौफ फैसले लेने वाले आकाओं पर लगाम कसने के लिए वैश्विक स्तर पर भी सूचनाओं का आदान-प्रदान तेज करना होगा। निसंदेह, विशिष्ट हस्तियों की सुरक्षा अहम है, लेकिन देश का हर आम नागरिक भी उतना ही सुरक्षित महसूस करने का हकदार है। जब तक कानून प्रवर्तन एजेंसियां इन गिरोहों की आर्थिक और रणनीतिक रीढ़ नहीं तोड़ेंगी, तब तक अपराध की यह जड़ें खत्म नहीं होंगी।

