मोनिका भोसले
फ्रांस की सड़कों से भड़की असंतोष की चिंगारी का पूरे यूरोप में आग की तरह फैलना केवल किसी एक देश की शिक्षा व्यवस्था की बदहाली का नतीजा नहीं है। यह उस गहरे सामाजिक और आर्थिक संकट का विस्फोट है, जो वैश्विक उदारीकरण और कॉरपोरेट मुनाफे की होड़ में लंबे समय से पक रहा था। एक तरफ जहां अभिजात वर्ग के लिए आधुनिक सुविधाओं से लैस महंगे निजी संस्थान फल-फूल रहे हैं, वहीं दूसरी ओर आम नागरिकों के लिए बने सरकारी स्कूल-कॉलेज बजट की कटौती और बदहाली का शिकार हैं। कल्याणकारी राज्य की जो अवधारणा कभी लोकतांत्रिक देशों की पहचान हुआ करती थी, वह अब विशुद्ध मुनाफे पर आधारित आर्थिक मॉडल में तब्दील हो चुकी है।
इस संकट को बढ़ाने में अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक उथल-पुथल ने जलते में घी का काम किया है। सदी में एक बार आने वाली वैश्विक महामारी के झटके से दुनिया पूरी तरह उबर भी नहीं पाई थी कि रूस-यूक्रेन संघर्ष, इजराइल-हमास युद्ध और ईरान पर थोपे गए आर्थिक-सामरिक दबावों ने दुनिया भर की आपूर्ति श्रृंखला को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। ईंधन के आसमान छूते दामों और वैश्विक खाद्य संकट ने हर आम परिवार के घरेलू बजट को झकझोर कर रख दिया है। इसका सबसे बुरा असर नई पीढ़ी (Gen-Z) पर पड़ा है, जो महंगी शिक्षा और घटते रोजगार के अवसरों के कारण अपने भविष्य को लेकर भारी अनिश्चितता में जी रही है।
लेकिन यूरोप में जलती गाड़ियों और मॉल-सुपरमार्केट में हो रही तोड़फोड़ के पीछे सिर्फ युवाओं की हताशा नहीं है। इस जनाक्रोश के पीछे एक गहरी और शातिर राजनीतिक स्क्रिप्ट भी लिखी जा रही है। स्पेन, फ्रांस, इटली, पोलैंड और ग्रीस जैसे देशों में आगामी चुनावों को देखते हुए विभिन्न राजनीतिक धड़े इस आग में अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने में जुटे हैं। जहां एक ओर दक्षिणपंथी पार्टियां सारे संकट का ठीकरा प्रवासियों के सिर फोड़कर जनाधार बटोर रही हैं, वहीं वामपंथी और श्रमिक संगठन इसे सत्ता पर काबिज होने के मौके के रूप में भुना रहे हैं।
इसके साथ ही, डिजिटल दौर में सोशल मीडिया की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। एक तरफ जहां इंटरनेट पर दिखती विलासिता भरी जीवनशैली और वास्तविक जीवन के अभावों का अंतर युवाओं को मानसिक रूप से उग्र बना रहा है, वहीं भ्रामक और उत्तेजक सामग्री के जरिए आंदोलन की दिशा मोड़ी जा रही है। जो नकाबपोश हुड़दंगी मॉल्स में लूटपाट कर रहे हैं, वे निश्चित रूप से अपने हक की लड़ाई लड़ने वाले छात्र या युवा नहीं हो सकते; वे उन निहित स्वार्थी तत्वों का मोहरा हैं जो सामाजिक शांति को भंग करना चाहते हैं।
यूरोप का यह उथल-पुथल भरा माहौल दुनिया भर की सरकारों के लिए एक चेतावनी है। यदि समय रहते आर्थिक विषमता की खाई को नहीं पाटा गया और केवल लोकलुभावन वादों के बजाय आम जनमानस की बुनियादी जरूरतों—सस्ती शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार—पर ध्यान केंद्रित नहीं किया गया, तो यह जनाक्रोश किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव को हिला सकता है।

