अर्चना त्रिपाठी
नवी मुंबई, जिसे कभी मुंबई के एक आधुनिक और सुनियोजित विकल्प के रूप में बसाया गया था, आज एक बड़े नीतिगत धर्मसंकट के मुहाने पर खड़ी है। शहर में सिडको द्वारा दशकों पहले बनाई गई पुरानी इमारतों के जर्जर होने के कारण पुनर्विकास की मांग तेज़ी से बढ़ी है। हालांकि, इस तेज़ी से होते कंक्रीट के विस्तार के बीच पीने के पानी की गंभीर किल्लत, सीवरेज और सड़कों का चरमराता ढांचा एक बड़ा सवाल खड़ा करता है। क्या हमें पहले नई गगनचुंबी इमारतों के निर्माण को प्राथमिकता देनी चाहिए, या फिर शहर के प्यासे नलों को पानी देने के लिए बुनियादी ढांचे को मजबूत करना चाहिए? यह बहस केवल बुनियादी सुविधाओं की नहीं, बल्कि शहर के अस्तित्व और भविष्य की दिशा से जुड़ी है।
एक दृष्टिकोण यह कहता है कि जल आपूर्ति और बुनियादी ढांचे में सुधार शहर की पहली प्राथमिकता होनी चाहिए। जब तक मोरबे बांध की क्षमता बढ़ाने, जल वितरण प्रणाली को दुरुस्त करने और नए जल स्रोतों की खोज, सड़क का विस्तार, पार्किंग की सुविधा, सीवर और पानी के पाईपलाईन बढ़ाने की क्षमता जैसे काम पूरे नहीं होते, तब तक नई ऊंची इमारतों के पुनःनिर्माण को मंजूरी देने पर अब नवी मुंबई में आम जनता के बिच बहस तेज हो गयी है।
वैसे दूसरे पहलू पर नजर दौड़ाये तो पुनर्विकास को प्राथमिकता देने का पक्ष भी उतना ही मानवीय और व्यावहारिक है। नवी मुंबई की कई 80-90 के दशक की सोसायटियां आज रहने लायक नहीं बची हैं और उनके पुनर्विकास को रोकना हज़ारों परिवारों की जान जोखिम में डालने जैसा है। इस प्रक्रिया से रियल एस्टेट सेक्टर को गति मिलती है और मनपा तथा सिडको को भारी राजस्व प्राप्त होता है। इसके अलावा, नई इमारतों में रेन-वॉटर हार्वेस्टिंग और एसटीपी जैसे आधुनिक उपकरण अनिवार्य होते हैं, जो दीर्घकालिक रूप से पानी बचाने में मदद करते हैं। परंतु, इसका सबसे भयानक दुष्परिणाम यह है कि 4 मंजिला इमारतों की जगह 30 मंजिला टॉवर बनने से जनसंख्या का घनत्व अचानक कई गुना बढ़ जाएगा, जिससे पुरानी सीवर लाइनें और जल आपूर्ति ढांचा पूरी तरह चरमरा जाएगा।
अंततः, नवी मुंबई के टिकाऊ भविष्य के लिए विकास का एक संतुलित और चरणबद्ध मॉडल अपनाना होगा। पुनर्विकास को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है क्योंकि नागरिकों की जीवन-सुरक्षा दांव पर है, लेकिन बुनियादी ढांचे को नजरअंदाज करके पुनर्विकास को बढ़ावा देने से व्यवस्था जरूर चरमरा सकती है।
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